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कुर्सियाँ कहाँ संभलती हैं

Writer: gunjan Rajputgunjan Rajput

Updated: Jan 6, 2022

बरसों की छिपी ख्वाइशें मानो,


एक साथ निकलती हैं


स्वयं की मुस्कुराहटों में, न जाने


कितनी आँखें विकलती हैं


एक ग़ुरूर, एक नशा घिरता है चारों ओर


फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं


- खुद ऊँचे, बाक़ी नीचे


अचानक नज़र आने लगते हैं


अपना रुतबा, अपना ज़ोर


आज़माने लगते हैं


दूसरों का हक़ लेने को-


उँगलियाँ मचलती हैं


फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं


कोई अपना हक़ माँग ले तो


नज़रों में हीनता दिखाई जाती है


मानव की नज़रों में मानवता


गिराई जाती है

छल-कपटता आँखों में चमकती है

फिर कुर्सियाँ कहाँ सँभलती हैं


@gunjanrajput



 
 
 

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